वरीय पत्रकार मनीष वत्स के फेसबुक से साभार।
चुनाव के दौरान छोटी पार्टियां ज्यादा से ज्यादा सीट लेने के लिए गठबंधन की बड़ी पार्टियों पर प्रेशर डालती है. ये कोई गलत बात भी नहीं है, जितना कि बड़ी पार्टियां प्रचारित करती रहती है. हर किसी को अपना कद और पार्टी का जनाधार बढ़ाने का हक है. गठबंधन में और होता ही क्या है, वोटों का ही तो लेनदेन होता है. आपके उम्मीदवार को हमारे लोग वोट देंगे और आप, हमारे उम्मीदवार के पक्ष में वोट ट्रांसफर कराएंगे. प्रमुख काम तो यही होता है. इस बार भी इनमें से ज्यादातर पार्टियां अपने घर-परिवार के लोगों, रिश्तेदारों और कुछ सेटिंग वालों को ही टिकट देकर सेट करती दिख रही है. समधियार के लोगों को भी. ऐसी पार्टियों के मुखिया या तो पुराने खिलाड़ी हैं या राजनीतिक खिलाड़ियों के चिराग हैं. ये सभी खिलाड़ी राजनीति के हर उल्टे-सीधे दांव-पेंच को बखूबी जानते भी हैं और आजमाते भी हैं.
सन ऑफ मल्लाह के नाम से चर्चित मुकेश सहनी की राजनीतिक अप्रोच को लेकर मेरे मन में दुविधा भले है, पर उनके राजनीतिक करियर को लेकर उनके प्रति सहानुभूति भी है. क्या इस बार भी उनके साथ 2020 वाला खेल होगा, जब खटपट होने के बाद उनके टिकट से जीते विधायक एक इशारे पर वापस अपनी मूल पार्टी में चले गए थे. जबकि, VIP पार्टी के मुखिया होते हुए भी मुकेश सहनी खुद अपना चुनाव हार गए थे. बीते पांच सालों में इनकी स्थिति में मैं फिलहाल दो बदलाव देख रहा हूं. पहला, गठबंधन बदलना और दूसरा 4 सीटों (अभी सिर्फ टिकट मिला है) का इजाफा होना. हालांकि, पिछले पांच साल में भी चुनाव लड़ने के लिए वे अपनी पार्टी में अधिक और जनाधार वाला नेता तैयार नहीं कर पाए. यही कारण है कि महागठबंधन में मिले 15 सीटों में से इनके उम्मीदवार ज्यादातर आयातित ही दिख रहे हैं. पिछले अनुभव को देखते हुए ऐसे उम्मीदवारों पर सन ऑफ मल्लाह कितना भरोसा कर रहे होंगे या चुनाव जीतने के बाद ये लोग मुकेश सहनी का भरोसा कितना जीत पाएंगे, यह तो आने वाला समय ही बता पाएगा.
फिलहाल इन्होंने जिन्हें टिकट दिया है, उन्हें एक बार जान लें. कहा जा रहा है कि 15 सीटों में सुगौली के साथ चार अन्य सीटों पर उन्होंने राजद नेताओं को प्रत्याशी बनाया है. इसी तरह चार-पांच सीटों पर भाजपा से जुड़े नेता वीआईपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. चार तो ऐसे नेता हैं, जो डायरेक्ट लैंड किए और टिकट हासिल कर लिए. ऐसे उम्मीदवारों के लिए सेटिंग के बदले मैं डेटिंग शब्द का इस्तेमाल करूंगा. मिलने का डेट लिया, टिकट के लिए प्रोपोज किया, निगोशिएट किया और टिकट लेकर नामांकन कर लिया. तीन तो विधान पार्षद के पुत्र-पुत्री हैं. गौर करने वाली बात यह है कि ये इनकी पार्टी के विधान परिषद नहीं हैं. इनकी अपनी VIP पार्टी के असली उम्मीदवार एक-दो ही दिख रहे हैं. इनमें एक सीट से इनके भाई लड़ रहे हैं. मोटे शब्दों में कहूं तो 15 उम्मीदवारों में से VIP पार्टी के समर्पित कार्यकता बमुश्किल से दो-तीन ही चुनाव मैदान में हैं. दूसरे पार्टियों में भी आयातित उम्मीदवार हैं. लेकिन, आपको ये मानकर चलना होगा कि वे पार्टियां अपर हैंड में है. उनकी पुरानी पार्टी है और पीछे से राजनीतिक विरासत की ताकत है. फिर भी यहां से भी कई नेता डगरा के बैंगन की तरह इधर-उधर होते रहते हैं. बावजूद, उनके पास नेताओं की संख्या है. आपको यह भी देखना होगा कि कम या ज्यादा, आपके समाज से भी कई लोग वर्षों से विधायक, सांसद और मंत्री बनते रहे हैं. वे किसी न किसी पार्टी की डोर को पकड़े हुए हैं और जी-खा रहे हैं.
मुकेश सहनी जी आप युवा हैं. थोड़ा जमीनी होइए. आप अपनी पार्टी के मुखिया हैं. आप जिनकी राजनीति कर रहे हैं, वे लोग आपकी ओर देख रहे हैं. कार्यकर्ता जुटाइए नहीं, अपना बनाइए. नेता आयात नहीं कीजिए, खुद का बनाइए. तभी आप वह कर पाने की स्थिति में होंगे, जैसा सोच रहे हैं. अन्यथा, विज्ञापनों और इंटरव्यू से आप चर्चा में बने रह सकते हैं, सीट भी जीत सकते हैं, लेकिन अपनी पार्टी के लिए समर्पित नेता नहीं बना पाएंगे. हर चुनाव के समय उम्मीदवार खोजना पड़ जाएगा. जिनसे आपका गबबंधन रहेगा, वे भी उचित/समुचित इज्जत (सीट) नहीं देंगे.


