
विश्वभारती विश्वविद्यालय के राजभाषा प्रकोष्ठ एवं हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय था— ‘राजभाषा हिंदी और वैश्विक मंच पर हिंदी की स्थिति एवं संभावनाएँ।’ इसमें देशभर से आए विद्वानों, शोधार्थियों और छात्रों ने हिंदी की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर विचार-विमर्श किया।
संगोष्ठी का उद्घाटन हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सुभाषचंद्र राय के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कहा कि हिंदी दिवस का आयोजन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि रवींद्रनाथ ठाकुर के भाषा-प्रेम को आगे बढ़ाने का प्रयास है। इस अवसर पर भारत सरकार के गृह मंत्री का राजभाषा संदेश भी पढ़ा गया।
प्रो. मृणाल कांति मंडल (अध्यक्ष, भाषा भवन) ने सभी भारतीय भाषाओं के समानांतर विकास की आवश्यकता रेखांकित की। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. मुक्तेश्वर नाथ तिवारी ने कहा कि हिंदी के विकास के लिए शब्दावली में सरलता और लचीलापन बनाए रखना आवश्यक है।
मुख्य वक्ता डॉ. विनय कुमार सिन्हा ने हिंदी की वैश्विक स्थिति पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किए। डॉ. सुकुमार पाल ने भारतीय भाषाओं के शब्दों को हिंदी में आत्मसात करने की बात कही, जबकि डॉ. दुखिया मुर्मू ने संताली और हिंदी के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। डॉ. हेमकुसुम ने चीन में हिंदी की स्थिति का विश्लेषण किया और साहित्यकार संजय पंकज ने हिंदी को वैश्विक बाजार की भाषा बताते हुए इसके अंतरराष्ट्रीय महत्व पर चर्चा की।
दूसरे दिन डॉ. चंद्रभानु प्रसाद सिंह ने विदेशों में हिंदी की बढ़ती स्वीकार्यता का उल्लेख किया। डॉ. शुभश्री सान्याल ने कहा कि हिंदी पूरे भारत में संवाद की उपयोगी भाषा है। विविध भाषी सत्र में डॉ. शरद कुमार जेना ने हिंदी में रोजगार की संभावनाओं पर बल दिया। डॉ. रणबीर सुमेध ने त्रिभाषा सूत्र के पालन की आवश्यकता बताई, वहीं डॉ. सौमी मंडल ने भाषा और मनोविज्ञान के संबंधों पर चर्चा की।
प्रो. शकुंतला मिश्र ने रवींद्रनाथ ठाकुर के हिंदी प्रेम को रेखांकित किया और हिंदी भवन की स्थापना को उसका प्रमाण बताया। डॉ. धनेश्वर मांझी ने हिंदी को सामासिक संस्कृति की वाहक कहा, जबकि प्रो. मानवेन्द्र साहा ने भाषा और साहित्य के व्यवहारिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। डॉ. रोजियो ने पूर्वोत्तर भारत में हिंदी की स्वीकार्यता पर ध्यान आकर्षित किया तथा डॉ. मादी लिंडा ने आदिवासी भाषाओं और हिंदी के अंतरसंबंधों की चर्चा की।
इस अवसर पर डॉ. वीरेंद्र पांडे और डॉ. रामचंद्र राय ने राजभाषा संबंधी तकनीकी पक्षों पर विचार रखे। विविध सत्रों का संचालन क्रमशः डॉ. मेरी हांसदा, डॉ. राहुल सिंह, डॉ. जगदीश भगत, डॉ. अर्जुन कुमार, डॉ. सुकेश लोहार एवं डॉ. अमन त्रिपाठी ने किया।
संगोष्ठी के अंतर्गत सांस्कृतिक संध्या का आयोजन भी हुआ, जिसमें छात्रों ने मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं। समापन सत्र में हिंदी दिवस पर आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्मानित किया गया तथा हिंदी के क्षेत्र में दीर्घकाल से कार्यरत विद्वान प्रो. प्रमोद कोवप्रत को विशेष सम्मान प्रदान कर परंपरा का निर्वाह किया गया।


